
ग्रीन हाइड्रोजन या ग्रीन मोनोपोली?
हमें बताया जा रहा है कि 2047 तक भारत ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा। कोयला नहीं। तेल नहीं। गैस नहीं। भारत ग्रीन हाइड्रोजन की महाशक्ति बनेगा। सुनने में शानदार लगता है। लेकिन एक साधारण नागरिक को एक और सवाल पूछना चाहिए—
इस पूरे सपने का सबसे बड़ा लाभार्थी कौन है? क्योंकि भारत में अब एक अजीब संयोग बार-बार दिखाई देता है। बंदरगाह हो — अडानी। एयरपोर्ट हो — अडानी। कोयला हो — अडानी। सोलर हो — अडानी। और अब ग्रीन हाइड्रोजन हो — फिर अडानी। इतने बड़े देश में, हजारों उद्योगपतियों और लाखों उद्यमियों के बीच हर रणनीतिक क्षेत्र का रास्ता बार-बार एक ही दरवाजे तक क्यों पहुँच जाता है?
यही असली प्रश्न है
2023 में राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन आया। सरकार ने लगभग 20,000 करोड़ रुपये का मिशन घोषित किया। लक्ष्य रखा गया कि 2030 तक भारत 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाएगा। इसी दौरान अडानी समूह ने इस क्षेत्र में अरबों डॉलर निवेश करने की घोषणा की।
अब ज़रा गणित समझिए
ग्रीन हाइड्रोजन हवा से नहीं बनती। उसे बनाने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए। भारी मात्रा में पानी चाहिए। हजारों एकड़ जमीन चाहिए।विशाल सौर पार्क चाहिए। पोर्ट चाहिए। पाइपलाइन चाहिए। यानी पूरा का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। और यही वह जगह है जहाँ कहानी दिलचस्प हो जाती है।
जमीन कौन देगा? सरकार। सब्सिडी कौन देगा? सरकार। पाइपलाइन कौन बनाएगा? सरकार। बंदरगाह और लॉजिस्टिक सपोर्ट कौन देगा? सरकार। जोखिम कौन उठाएगा? जनता। लेकिन मुनाफा? वह निजी होगा।
यही मॉडल आज भारत में बार-बार दिखाई देता है
लाभ निजी। जोखिम सार्वजनिक। और इसे राष्ट्रनिर्माण कहा जाता है। कहा जाता है कि देश को बड़े खिलाड़ियों की जरूरत है। ठीक बात है। लेकिन सवाल यह नहीं कि अडानी निवेश क्यों कर रहा है। सवाल यह है कि क्या भारत की पूरी ग्रीन एनर्जी क्रांति का केंद्र केवल कुछ गिने-चुने कॉरपोरेट घराने होंगे?
क्योंकि यदि ऊर्जा का भविष्य भी कुछ हाथों में केंद्रित हो गया, तो कल बिजली की तरह हाइड्रोजन भी एक आर्थिक हथियार बन सकती है। और यहीं ग्रीन हाइड्रोजन का सपना ग्रीन मोनोपोली में बदलने लगता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी बहस को पर्यावरण के नाम पर पेश किया जाता है
जो भी सवाल पूछे, उसे विकास विरोधी बता दो। जो जवाबदेही मांगे, उसे प्रगति का दुश्मन बता दो। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता। विशेषकर तब, जब हजारों करोड़ रुपये जनता के हों।
एक साधारण नागरिक को सिर्फ इतना पूछने का अधिकार है
अगर यह राष्ट्रीय परियोजना है तो इसका लाभ पूरे देश को क्यों नहीं दिखता? अगर यह आत्मनिर्भरता है तो नियंत्रण कुछ हाथों में क्यों सिमट रहा है? अगर यह हरित क्रांति है तो इसके केंद्र में बार-बार वही नाम क्यों दिखाई देता है?
अडानी की सफलता का प्रश्न अलग है। भारत के भविष्य का प्रश्न अलग। …और लोकतंत्र में दोनों को एक ही चीज़ मान लेना सबसे खतरनाक भूल होती है। क्योंकि ऊर्जा केवल बिजली नहीं होती। ऊर्जा शक्ति होती है। और जो शक्ति को नियंत्रित करता है, वही भविष्य को नियंत्रित करता है।































