
आगे भी तेजस्वी प्रसाद की राह नहीं आसान
महागठबंधन में रोजाना होने वाली बैठकों के दौर के बावजूद सीट बंटवारे पर बढ़ती कलह, एक-दूसरे की सीटों पर प्रत्याशी उतारने का सिलसिला, राजद और माले के बीच अड़ियल रवैये के कारण सीट समझौता पर बहुत दिनों तक कोई हल नहीं निकलना, ओवैसी और अख्तारूल इमाम द्वारा गठबंधन में शामिल करने के आग्रह को तेजस्वी यादव द्वारा नकारकर ‘एकला चलो’ की भूल, गठबंधन में झामुमो को एक भी सीट नहीं देना, महागठबंधन को अंदर से खोखला कर चुका था।
चुनाव परिणाम में दिखा कि इस बार महागठबंधन में शामिल दल, एक-दूसरे के उम्मीद्वार को अपना वोट नहीं दिला पाए, जो कि 2020 के विधान सभा चुनाव में हुआ था। बहुत-सी सीटों पर यादव जाति ने महागठबंधन के घटक दल के प्रत्याशी को वोट ही नहीं दिया। डुमरांव आदि में राजद के लोग माले के उम्मीद्वार को बहुत कम वोट दिए। कुशवाहों का भी इस बार NDA की तरफ झुकाव था।
राजद ने कांग्रेस की कई सीटों जैसे वारिसलीगंज, सिकंदरा, कुटुंबा आदि में अपने प्रत्याशी उतार दिए। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की सीट कुटुंबा पर राजद ने पूर्व मंत्री सुरेश पासवान को सिंबल दे दिया। सिकंदरा से कांग्रेस ने विनोद चौधरी को सिंबल दिया था। जबकि राजद ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी को टिकट दे दिया। इसके अलावा वारिसलीगंज पर भी राजद ने उतारे प्रत्याशी अनिता देवी को मैदान में उतारा। इससे पहले कांग्रेस यहां से सतीश कुमार सिंह उर्फ मंटन सिंह को सिंबल दे चुकी थी।
कहलगांव, वैशाली और लालगंज में कांग्रेस-राजद दोनों एक-दूसरे के खिलाफ प्रत्याशी उतारे थे। कुर्था, सासाराम, डिहरी, कटिहार पर भी राजद और कांग्रेस दोनों दावा कर रहे थे। यानी करीब 10 सीटों पर कांग्रेस और राजद के बीच दोस्ताना संघर्ष के हालात बने। कांग्रेस ने 5 और सीटों पर प्रत्याशियों के एलान कर दिया था। नरकटियागंज से शाश्वत केदार पांडे, किशनगंज से कमरुल होदा, कसबा से इरफान आलम, पूर्णिया से जितेंद्र यादव, गयाजी से मोहन श्रीवास्तव को टिकट दिया। इससे पहले सिकंदरा से विनोद चौधरी को सिंबल दिया था। जबकि NDA वाले पूरी मुस्तैदी से एकजुट थे।
यह भी गौरतलब है कि, खुद को तेजस्वी यादव का मुंहबोला समर्थक बनकर घूमनेवाले गालीबाज जतिसूचक वीडियो क्लिप जारी कननेवाले सड़क छाप सिंगर जातिसूचक गीतों ‘सलामियों करबे अहीर के’ की धूम अपनी रंगदार की छवि बनाकर तेजस्वी यादव के साथ सेल्फी लेकर शेयर कर रंगदारी का लाइसेंस जारी करवा रहे थे। इसका खामियाजा राजद को ही भुगतना पड़ा।
कन्हैया, पप्पू यादव और भाई-बहनों को साइडलाइन करते-करते खुद साइड लाइन होते गए तेजस्वी प्रसाद। लालू प्रसाद को पोस्टर से हटाते ही खुद राजनीति के अहम मंच से हाशिये पर चले गए। अगली बार लालू प्रसाद जी कारगर नहीं रहेंगे और भाई-बहनों का विरोध सिर चढ़कर बवाल पैदा कर सकता है। अब तेजप्रताप और रोहिणी आचार्या समर्थक स्वजातीय, तेजस्वी यादव को धौंस देनेवाले, रूखे और गुस्सैल बताने लगे हैं। इस बार तेजस्वी का फिसलना, सत्तासीन होने के सपनों पर लगभग अंतराल पैदा करेगा —और वे दिनोदिन कमजोर हो सकते हैं।





