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कई देश हैं इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बता रहे हैं

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला, सिर्फ अमेरिका और वेनेजुएला का टकराव नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि दुनिया शक्ति के इस्तेमाल को कैसे देखती है। कहीं इसे लोकतंत्र और सुरक्षा के नाम पर जरूरी बताया जा रहा है, तो कहीं इसे संप्रभुता पर हमला माना जा रहा है। भारत जैसे देश संतुलन साधने की कोशिश में हैं, जबकि यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। एक तरफ वे देश हैं जो इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बता रहे हैं। तो दूसरी ओर कुछ देश ऐसे हैं जो अमेरिका के कदम को सही ठहरा रहे हैं।

क्या है पूरा मामला ?

अमेरिका ने वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करते हुए सत्ता परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाया। ट्रंप प्रशासन ने इसे ‘नार्को-टेररिज्म के खिलाफ कार्रवाई’ बताया और दावा किया कि यह कदम क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए जरूरी था। लेकिन इस कार्रवाई के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। वेनेजुएला में लोग बोले, ‘अमेरिका को न तो आज़ादी में दिलचस्पी है और न ही लोकतंत्र में, उसे सिर्फ़ हमारे तेल और प्राकृतिक संसाधनों में रुचि है।’

अमेरिका के खिलाफ कौन-कौन से देश खड़े हैं ?

रूस, चीन, ईरान, क्यूबा, ब्राजील, मेक्सिको, कोलंबिया, चिली, बेलारूस, उरुग्वे, स्लोवाकिया, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, श्रीलंका, उत्तर कोरिया, घाना और सिंगापुर समेत 17 से ज्यादा देशों ने अमेरिका की कार्रवाई की आलोचना की है। इन देशों का कहना है कि यह कदम वेनेजुएला की संप्रभुता पर सीधा हमला है और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। खास बात यह है कि अमेरिका के भीतर भी ट्रंप सरकार के फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं और इसे जल्दबाजी भरा कदम बताया जा रहा है।

कौन से देश अमेरिका के समर्थन में आए ?

दूसरी तरफ अर्जेंटीना, इजरायल, पेरू, अल साल्वाडोर, इक्वाडोर, अल्बानिया, फ्रांस और ब्रिटेन ने अमेरिका के कदम का समर्थन किया है। इन देशों का मानना है कि मादुरो सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन कर रही थी और बाहरी दबाव जरूरी हो गया था। यूरोप के कुछ देशों ने इसे लोकतांत्रिक बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम बताया है।

भारत ने क्या रुख अपनाया ?

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संतुलित और संयमित रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वेनेजुएला में हाल की घटनाएं गहरी चिंता का विषय हैं। भारत ने दोनों पक्षों से अपील की है कि वे बातचीत और कूटनीति के जरिए इस संकट का समाधान निकालें। भारत ने साफ किया कि वह वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और भलाई के लिए प्रतिबद्ध है और काराकास में भारतीय दूतावास भारतीय समुदाय के संपर्क में है।

यूरोप से कैसे आए अलग-अलग सुर ?

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि इटली ने मादुरो की खुद घोषित चुनावी जीत को कभी मान्यता नहीं दी और लोकतांत्रिक बदलाव का समर्थन किया है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि तानाशाही शासन को खत्म करने के लिए बाहरी सैन्य कार्रवाई सही रास्ता नहीं है। मेलोनी ने कहा कि अगर सुरक्षा के खिलाफ हाइब्रिड हमले हों, खासकर नशीली दवाओं की तस्करी जैसे मामलों में, तो दखल को आत्मरक्षा के तौर पर देखा जा सकता है। साथ ही उन्होंने वेनेजुएला में रह रहे इटालियन नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि इटली ने मादुरो की खुद घोषित चुनावी जीत को कभी मान्यता नहीं दी और लोकतांत्रिक बदलाव का समर्थन किया है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि तानाशाही शासन को खत्म करने के लिए बाहरी सैन्य कार्रवाई सही रास्ता नहीं है। मेलोनी ने कहा कि अगर सुरक्षा के खिलाफ हाइब्रिड हमले हों, खासकर नशीली दवाओं की तस्करी जैसे मामलों में, तो दखल को आत्मरक्षा के तौर पर देखा जा सकता है। साथ ही उन्होंने वेनेजुएला में रह रहे इटालियन नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।

ऑस्ट्रेलिया ने क्यों की डिप्लोमेसी की अपील ?

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत से समाधान निकालने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया वेनेजुएला की स्थिति पर नजर रखे हुए है और लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और बुनियादी स्वतंत्रताओं के सम्मान का समर्थन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बदलाव का पक्षधर है।