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तेजस्वी यादव की ताजपोशी करानी थी तो ‘मैनेज्ड उम्मीदवार’ की तरह कई कमजोर प्रत्याशी क्यों दिया गया था?

बिहार विधान सभा चुनाव के बाद राजद विपक्ष में है। जबकि, चुनाव पूर्व संजय यादव ने खुद सर्वे कराकर रिपोर्ट तैयार की थी। इसके बाद 33 विधायकों के टिकट कट गए। नतीजा यह हुआ कि बेटिकट हुए कई विधायक बगावती तेवर अपनाकर दूसरी पार्टियों में चले गए या फिर निर्दलीय मैदान में कूद पड़े। तेज प्रताप यादव का निष्कासन और चुनावी घोषणा से ठीक पहले रोहिणी आचार्य की नाराजगी ने यह साफ संकेत दिया कि लालू परिवार अंदर से एकजुट नहीं है।

ऊपर से पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद के बैनर-पोस्टर से गायब होने ने ‘लालूवाद’ के समर्थकों को और मायूस कर दिया। महागठबंधन में सीटों के बंटवारे में विलंब, गलत सीट वितरण, बिहार की जगह हरियाणा और दिल्ली से यूटूबर बुलाकर प्रचार का दिखावा किया गया। चुनावी रणनीति, सोशल मीडिया कैंपेन और जबकि ‘हर घर नौकरी’ जैसे वादे जनता को विश्वसनीय नहीं लगे। यदि तेजस्वी यादव की ताजपोशी करानी थी तो ‘मैनेज्ड उम्मीदवार’ की तरह इतने कमजोर प्रत्याशी क्यों दिया गया था?

इधर, पटना में तेजस्वी प्रसाद यादव ने वरिष्ठ नेताओं संग लंबी बैठक की। इसके बाद जिले और प्रमंडल स्तर के प्रभारियों को हार की वजहों पर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया। जब इन नेताओं से बात हुई, तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। जिलास्तर के नेताओं ने साफ कहा कि करारी हार की मुख्य वजह संगठन और उम्मीदवारों के बीच तालमेल की पूरी तरह कमी थी। टीम संजय की ‘पेड टीम’ ने जिला और प्रखंड स्तर के पुराने कार्यकर्ताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

राजद की समीक्षा बैठक ‘भीतरघात’ की बात हो रही थी। तेजस्वी जी आप टिकट दीजिएगा इंग्लैंड से बुलाकर, झारखंड से बुलाकर, सुप्रीम कोर्ट से बुलाकर, आपके पास पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता और नेता जब टिकट के लिए आपसे बात करने जाते थे तो आपके मुंह से एक ही शब्द निकलता था- ‘‘संजय जी से बात कर लीजिए।’’ चुनाव के समय आपने कितने जिला अध्यक्ष और संगठन के लोगों से बात विचार करके टिकट बांटा? टिकट बंटवारा में जिसको संजय यादव गैंग ने चाहा, उसी को टिकट मिला।

जबकि, लालू जी की तरह आपने कब कार्यकर्ता से मिलने के लिए अपने गेट का दरवाजा खोला ? क्या आपसे मिलने के लिए पहले संजय यादव, अदनान, रमीज आदि से बात करके उसके सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता था? संजय यादव कितने समर्पित कार्यकर्ता का फोन उठाते थे? सर्वे का आधार पर कितना टिकट दिया आपने? आपके आसपास रहने वाले लोग खुद को आपसे बड़ा नहीं समझते है? क्या आपके आसपास रहने वाले लोगों से पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता खुश हैं? चुनाव से पहले आपके अंदर अहंकार चरम सीमा पर नहीं था?

बाहरी एजेंसियों से ‘सीट सर्वे’ कराने का खूब ढोल पीटा गया। ‘सीट सर्वे’ का इतना ढोल पीटने के बावजूद, समय रहते उम्मीद्वारों का चयन नहीं हो सका था। जो उम्मीद्वार उतारे गए, उसमें परिहार, कुर्था, मखदुमपुर, गोविन्दपुर, नवीनगर, दिनारा जैसे दर्जनों सीटों पर गलत उम्मीद्वारों का चयन हुआ था। गोह विधान सभा में NDA के गलत उम्मीद्वार के चलते राजद जीता, क्योंकि छोटू मुखिया हत्याकांड और सुजीत मेहता हत्याकांड के विरोध में रणविजय शर्मा के विरोध में कुशवाहा समाज गोलबंद हो गया था। अगर रणविजय शर्मा के बदले NDA का दूसरा उम्मीद्वार होता तो गोह सीट पर भी राजद की हार निश्चत थी।

इस बार ‘बाहरी सोच’ ने खासा नुकसान पहुंचाया। महागठबंधन ‘बाहरी लोगों’ के कारण इस बार हार गया। मीडिया से बात करते समय विनम्र बने रहना था। एरोगेंस दिखाने की जरूरत नहीं थी। पर्सनल हमले की जगह मुद्दों पर टिके रहना था। तेजस्वी प्रसाद अब भी अपने कार्यकर्ताओं की पुकार सुनेंगे या ‘अगल-बगल’ वालों के कहने पर वोट चोरी और कोसने वाली ही राजनीति पर फोकस्ड रहेंगे? जीते हुए विधायकों में मात्र 10% विधायक ही जीतकर आए हैं। इसका कारण है कि राजद का बूथ लेवल पर कैडर लोग नहीं हैं।

कुछ प्रखंडों की बातें बताऊं तो बूथ एजेंट वोटिंग के एक दिन पहले बनाया गया था। जब पता चला कई पंचायत में कोई बूथ एजेंट नहीं है लेकिन जब कागज आप राजद के ऑफिस में ढूंढ़ेंगे तो हर बूथ पर 5 लोगों को एजेंट बनाया जा चुका है वो कागज कौन बनाता है, कब बनता है किसी को कानों-कान ख़बर नहीं है? जबकि, बूथ चुनाव का सबसे बेसिक स्ट्रक्चर है, वहीं आप गायब हैं। बस सोशल मीडिया और कागज पर लोग से यही परिणाम आते रहेंगे।

आप टिकट देते हैं और आपके विधायक वहां के स्थानीय मुखिया, प्रमुख के फेर में फंस जाता है। वहीं पर आपका खेल खत्म किया जाता है क्योंकि मुखिया आपका है नहीं, प्रमुख आपका है नहीं। — होगा भी कैसे, उसके लिए कोई कनेक्शन लाइन ही नहीं है। इसका सॉल्यूशन है कि 2026 के त्रिस्तरीय चुनाव में यानी पंचायत चुनाव में भी राजद अपने कैडर लोगों को चुनाव लड़वाए, जैसे-तैसे करता है। जब हर गांव, हर पंचायत में आपके कैडर लोग मजबूत होंगे, तो आपके सामाजिक समीकरण को जमीन पर उतारने में समय नहीं लगेगा।

एक समय था जब लालू प्रसाद जी को अपने कैडर लड़कों, नेताओं का घर-पता मुंह जुबानी याद होती थी। कौन मुखिया है, कौन प्रमुख है, कौन पंचायत अध्यक्ष है ये सब उनके दिमाग में एक चिप की तरह फिट होता था। आज सबकुछ कागज पर है, पीडीएफ में है, लैपटॉप में है। ये सभी चीजें लैपटॉप से हटाकर अपने खुद के फोन और खुद के कार्यशैली में डालना होगा। उनको VIP कल्चर पसंद आ गया है पटना का। —गांवों में उनको मिट्टी और धूल लगती है। राजद को एक ऐसी एक ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिसमें हर पंचायत में अपने कैडर लड़के को बैक एंड से सपोर्ट करे, उन्हें नेतृत्व करने का मौका दे, जीतने के लिए मदद करे।