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Hamari Aawaj Aap Tak


इंसान की सुरक्षा और जानवर की रक्षा, दोनों ज़रूरी है

गाजियाबाद में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज़ है। कुछ लोग शेल्टर होम में रखने के पक्ष में हैं, तो कुछ विरोध कर रहे हैं। यह विवाद सिर्फ जंग नहीं, बल्कि कई पुराने दर्दनाक मामलों की याद भी दिला रहा है।

दिल्ली में आवारा कुत्तों को बचाने के लिए आंदोलन करने वाले “पशु-प्रेमी” शायद भूल गए हैं कि असली प्रेम संतुलन में होता है
इंसान की सुरक्षा और जानवर की रक्षा, दोनों ज़रूरी हैं। लेकिन यहां हालात ऐसे हैं कि सैकड़ों बच्चे कुत्तों के काटने से अस्पताल पहुंचते हैं, बुज़ुर्ग सड़कों पर गिरकर घायल होते हैं, और फिर भी पूरा ध्यान “कुत्ते के अधिकार” पर ही है।

ये लोग अदालतों और मीडिया में इंसानों की सुरक्षा की बजाय कुत्तों की आज़ादी का केस लड़ रहे हैं, जैसे दिल्ली में अब “मानव” नहीं, “कुत्ता साम्राज्य ” चलता हो। आवारा कुत्तों का अनियंत्रित बढ़ना सिर्फ काटने का खतरा नहीं, बल्कि रेबीज़, प्रदूषण और सड़क हादसों जैसी गंभीर समस्याएं भी लाता है।

आवारा कुत्तों का नियंत्रण न केवल पशु कल्याण का मुद्दा है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा से भी जुड़ा है

पिछले वर्षों में कई बच्चे कुत्तों के काटने से अपनी जान गंवा चुके हैं। 14 वर्षीय किशोर को 2023 में रैबीज़ के कारण पिता की गोद में ही दम तोड़ना पड़ा। वहीं, 3 वर्षीय बच्चे की मौत 2024 में इसी तरह की घटनाओं के चलते हुई। ये घटनाएं याद दिलाती हैं कि आवारा कुत्तों का नियंत्रण न केवल पशु कल्याण का मुद्दा है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा से भी जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने शेल्टर होम बनाने का आदेश दिया है ताकि ऐसे हादसों को रोका जा सके। यह फैसला यह भी बताता है कि समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ जानवरों की सुरक्षा और वैक्सीनेशन सुनिश्चित करें।

सालाना 3.7 लाख लोग यानी रोजाना लगभग 10,000 लोग कुत्तों के काटने से मरते हैं :तुषार मेहता

दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कुत्तों के काटने से होने वाली मौतों का मुद्दा उठाया और समाधान की मांग की। उन्होंने कहा कि सालाना 3.7 लाख लोग यानी रोजाना लगभग 10,000 लोग कुत्तों के काटने से मरते हैं। वहीं, कपिल सिब्बल ने कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर होम न होने की बात कही और आदेश पर रोक लगाने का आग्रह किया।

सॉलिसिटर जनरल ने मज़ाकिया अंदाज में कहा कि कई लोग मांस खाते हैं और फिर खुद को पशु प्रेमी कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय अधिकारियों को कुत्तों के लिए आश्रय स्थल बनाने और उनकी जिम्मेदारी निभाने का निर्देश दिया।

इस मामले से हमें याद रखना चाहिए कि जानवरों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। रेबीज और काटने से होने वाले संक्रमणों से बचाव के लिए जागरूक रहना, संक्रमित जानवरों से दूरी बनाना और पशु कल्याण उपाय अपनाना जरूरी है।

इस जनसमस्या पर सभी को मिल कर समाधान निकालना चाहिए —

● बड़े पैमाने पर स्टरलाइज़ेशन (बन्ध्याकरण)

● कुत्तों के लिए अलग शेल्टर होम

● ज़रूरतमंद और प्रशिक्षित लोगों द्वारा गोद लेना

● इनको अभ्यारण्य में बसाना

● और इंसानों की सुरक्षा के लिए सख्त ज़ोनिंग नियम

पशु-प्रेम अच्छा है, लेकिन अगर प्रेम का संतुलन बिगड़ जाए तो वो समाज के लिए मुसीबत बन जाता है

मेनका गांधी ने आवारा कुत्तों को हटाने के फैसले पर सवाल उठाए गए हैं। उनका तर्क है कि इस तरह के फैसले के गंभीर और विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं, जैसा कि अतीत में देखा गया है। 1994 में गुजरात के सूरत नगर निगम आयुक्त ने शहर के सभी कुत्तों को मारने का आदेश दिया।

दो हफ्तों में सारे कुत्ते मारे गए. ठीक दो हफ्ते बाद दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में से एक ब्यूबोनिक प्लेग का पहला मामला सामने आया। शिकारी कुत्तों से बेखौफ चूहे जमीन पर आ गए और शहर भर में फैल गए। ढेरों लोग चूहों के काटने का शिकार हुए और प्लेग के तीन मामले दर्ज हुए। भारत भर में लोग मास्क पहनने लगे, निर्यात रुक गया और पर्यटन लंबे समय तक ठप हो गया।