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चील, कौवे और सियार की तरह लाश का इंतजार करते सियासी गिद्धों में कई “अपने” है तो कई “गैर” है

नीतीश कुमार का सियासी मर्सिया कब नहीं पढ़ा गया? सियासी माफियाओं की शह पर 2019 लोकसभा चुनाव के पहले, फिर 2020 विधानसभा चुनाव के पहले और चुनाव के बाद लगातार पढ़ा गया। 2024 लोकसभा में और फिर 2025 विधानसभा के पहले और बाद में भी पढ़ा जाता रहा है, रहेगा। पूरी शिद्दत के साथ… चील, कौवे और सियार की तरह लाश का इंतजार करते सियासी गिद्धों में कई “अपने” है तो कई “गैर” है। लेकिन नीतीश है कि मरते नहीं… मीडिया से लेकर सियासी माफिया तक, सब झांक झांक कर जदयू की तरफ देखते हैं कि नीतीश मरे कि नहीं।

गिद्धों से घोंसले नहीं बनते हैं.. ये सृजन नहीं जानते हैं

काश! ये सियासी गिद्ध इतनी चिंता अपने जीने की करते तो इनका इकबाल बुलंद हो गया होता। हैरत है कि ये सुबह उठ कर श्मशान के श्वान की तरफ लाश के लिए रोते हैं। यकीन करिए, गिद्धों से घोंसले नहीं बनते हैं.. ये सृजन नहीं जानते हैं। सृजन के बीज जिनमें छिपे होते हैं वो शमशान में बैठ लाश का इंतजार नहीं करते; वो उड़ान भरते हैं.. खर-पतवार चुनते हैं और घोंसले बनाते हैं।

बिहार में नीतीश कुमार का विकल्प नहीं है। जो विकल्प होगा वो किसी के मरने की इंतजार नहीं करेगा, वो सृजनहार होगा।… बिहार का तारणहार होगा। अफसोस है कि बिहार की सियासत के बाजार में दलाल और बदतमीज भरे हैं। न इनकी कोई अपनी सोच है और बिहार के प्रति कोई दूरदर्शी कार्यक्रम है।

नीतीश कुमार अपनी सियासत के 30 साल शीर्ष पर बिता चुके हैं

कुछ अखबार की कतरन, कुछ रिपोर्ट्स के आंकड़े ले कर ये ऐसे विचरण करते हैं जैसे कोई कट्टा लेकर सड़क का मवाली घूमता है। नीतीश कुमार अपनी सियासत के 30 साल शीर्ष पर बिता चुके हैं। न कोई दाग, न कोई नाकामियों का बोझ.. नीतीश जी के पांव जिस क्षेत्र में पड़े, उसे संवारने का काम बड़ी शिद्दत से किया है। बिहार उनकी उपलब्धियों पर नाज करेगा।

लेकिन नीतीश जी अकेले नहीं हैं। वरना, नीतीश जी को तो कब ही सियासी रूप से मार दिया गया होता। वो कौन है…. जिसके वोट से नीतीश जी जिंदा है।… जिनकी इच्छा है कि नीतीश की राजनीति को खत्म कर देंगे, उन्हें पहचान तो होनी चाहिए कि किसके दम पर नीतीश कुमार जिंदा हैं। क्या ये लोग नीतीश कुमार की सियासत को खत्म होने देंगे?

नीतीश कुमार की हड्डियों में जब तक जान रहेगा, तब तक कोई मीडिया ट्रायल, कोई भी संकट नीतीश जी से अलग नहीं कर सकती है

यदि सियासी गिद्ध इतना भी अनुमान नहीं लगा सकते हैं तो इन्हें लानत है। नीतीश कुमार के वोटर जो बिहार की के कुल वोटरों के कम से कम 30% हैं, कहीं नहीं जाने वाले हैं। नीतीश कुमार की हड्डियों में जब तक जान रहेगा, तब तक कोई मीडिया ट्रायल, कोई भी संकट की घड़ी इनको नीतीश जी से अलग नहीं कर सकती है। यदि नीतीश कुमार बिहार को बहुत प्यार करते हैं इस बिहार में वैसे भी लोग हैं, जो नीतीश कुमार को और उनकी सियासत को भी बहुत प्यार करते हैं।

धोखे से लगा कोई भी खंजर बिहार के 30% लोगों को भी कष्ट देगा

संभव है कि पीठ पर खंजर लगे, लेकिन धोखे से लगा कोई भी खंजर बिहार के 30% लोगों को भी कष्ट देगा। क्या हम नहीं जानते कि मीडिया ट्रायल करने वाले लोग कौन हैं? क्या हम नहीं जानते कि ये “अपने” बन सितम ढाने वाले गैर कौन है? क्या हम नहीं जानते कि कौन सी गलतियां किस पर भारी पड़ी है? क्या हम नहीं जानते कि किसकी कितनी औकात है?

घोड़े खरीद लेने से गांव सुनसान नहीं होते

नीतीश जी को चाहने वाले सब जानते हैं। लेकिन चुप्पी उनकी आदत है, हाशिए पर होना उनका नसीब है। बिहार को ऐसी सियासत से ही आगे बढ़ाया जा सकता है। नीतीश जी की सियासी लकीर ही बिहार की तरक्की का रास्ता है। नीतीश जी की सियासत जिंदा रहेगी, उसी चरित्र के साथ… उनके जिंदा रहते और उनके बाद भी। याद रखें कि घोड़े खरीद लेने से गांव सुनसान नहीं होते।