
सैकड़ों लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए उपस्थित थे
12 सितंबर 2026 को पूर्व मंत्री स्वर्गीय तुलसीदास मेहता जी की सातवीं पुण्यतिथि पटना स्थित ‘जगजीवन राम संसदीय शोध संस्थान’ में मनाई गई। इस अवसर पर उनके सुपुत्र और वर्तमान में विधायक पूर्व मंत्री राजस्व एवं भूमि सुधार और गन्ना उद्योग विभाग के प्रभारी मंत्री आलोक कुमार मेहता जी, राजद नेता पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजश्वी प्रसाद और पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम के अलावा सैकड़ों लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए उपस्थित थे।

मेहता जी का लोकनायक जय प्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के साथ उनका निकट का संबंध था
उल्लेखनीय है कि, तुलसी दास मेहता जी पहली बार 1962 में सोश्लिस्ट पार्टी की टिकट पर विधायक बने। 1969 में पहली बार राज्य मंत्री बने थे। इसके बाद 1990 से 95 तक उर्जा मंत्री और 1995 से 2000 तक वन एवं पर्यावरण मंत्री बने। लोकनायक जय प्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के साथ उनका निकट का संबंध था।
मेहता जी अपने मृदुभाषी स्वभाव और राजनीति में अपने उच्च आदर्शों के लिए सदैव जाने जाते रहे
स्व. तुलसी दास मेहता जी कुशल राजनेता के साथ ही प्रखर समाजवादी भी थे। स्व. मेहता जी अपने मृदुभाषी स्वभाव और राजनीति में अपने उच्च आदर्शों के लिए सदैव जाने जाते रहे। अपने लंबे राजनीतिक-सामाजिक जीवन में मेहता समाज के दबे, कुचले और कमजोर वर्गों से जुड़े रहे। तुलसी दास मेहता जी का जीवन सादगीपूर्ण था। वे आजीवन जन समस्याओं के प्रति गंभीर रहे।

समावेशी और प्रगतिशील सोच के धोतक थे तुलसीदास मेहता जी
बिहार की राजनीति में ‘तुलसीदास मेहता’ एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के अपने सामाजिक और राजनीतिक कार्यों की अमिट छाप छोड़ी। तुलसीदास मेहता समावेशी विकास की वह सोच थे, जो राजनीति में अदृश्य रहकर भी धागे की तरह समाज को जोड़ते रहे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से दबे-कुचले, पिछड़े और वंचित वर्गों के विकास को लेकर एक सोच तैयार की।
तुलसीदास मेहता समाजवाद का वह सोच थे, जो वैशाली की धरती पर स्थापित किया। हम बात कर रहे हैं बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और कुशवाहा समाज में अदृश्य रहकर कुशवाहा राजनीति को 1962 से लेकर 2000 के दशक तक मजबूत करने वाले एक ऐसे नेता की, जो समाजवादी सोच के साथ-साथ समावेशी विकास के परिचायक और द्योतक थे।
तुलसीदास मेहता पहली बार 1962 में विधायक बने। 1962 वह काल था, आज़ादी के 14-15 वर्षों के बाद, जब एक साधारण किसान परिवार में जन्मा व्यक्ति, जिसकी आर्थिक संपन्नता भी न के बराबर हो, वह विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए निकलता है और उसकी जेब में चुनाव के खर्च के लिए पैसे तक नहीं होते। तब सामने से उनकी पत्नी सबसे पहले आकर कहती हैं– “मेरे गहने ले जाइए। आप एक उद्देश्य भरे रास्ते को तय करने के लिए निकले हैं, तो इस रास्ते में पैसों की कमी नहीं होनी चाहिए।” …और इस तरह पत्नी के दिए हौसले और परिवार के साथ को लेकर तुलसीदास मेहता राजनीति में 1962 का चुनाव लड़ने निकलते हैं।

1962 के चुनाव की कहानी
अक्षयवट राय जी तुलसीदास मेहता जी के राजनीतिक गुरु थे। उन्हीं के संरक्षण में तुलसीदास मेहता जी को जंदाहा विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी का टिकट मिला। उनके सामने कांग्रेस पार्टी के मजबूत उम्मीदवार राजवंशी बाबू थे, जो उस समय मुजफ्फरपुर जिला को-ऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन हुआ करते थे। कांग्रेस पार्टी ने उस समय प्रचार के लिए जीप खरीदी थी और उनमें से एक जीप राजवंशी बाबू को भी प्रचार के लिए मिली थी।
वहीं तुलसीदास मेहता जी का चुनाव प्रचार टमटम (ताँगा) से होता था। कुछ लोग समूह बनाकर साइकिल से भी प्रचार करते थे। जिस गाँव में रात में रुकना होता था, वहाँ अलग-अलग लोगों के घरों में रुकने की व्यवस्था की जाती थी, ताकि सभी के घरों में भोजन मिल सके।
उस समय इलाके में अकाल पड़ा हुआ था। ऐसे कठिन दौर में सीमित साधनों के साथ गाँव-गाँव घूमकर चुनाव प्रचार किया गया। समाजवादी कार्यकर्ताओं के दम पर कम आर्थिक खर्च में चुनाव जीतते हैं और बिहार विधानसभा के पटल पर आकर बैठते हैं।

राजवंशी बाबू ने अपने ही आवास में तुलसीदास मेहता जी के लिए एक कमरा दे दिया
चुनाव जीतने के बाद जब वे पटना पहुँचे तो उनके सामने रहने की समस्या थी। उस समय उनके पास पटना में ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए वे राजवंशी बाबू के आवास पर पहुँचे और उनसे कहा कि जब तक सरकारी आवास नहीं मिल जाता, तब तक रहने की व्यवस्था करवा दीजिए। .शुरुआती दिनों में तुलसीदास मेहता जी राजवंशी बाबू के यहां रहने लगे
जब वहां से घर के लिए आ रहे थे तो राजवंशी बाबू ने एक साड़ी का बंडल दिया और साथ में अपने नौकर को भेजा। चूंकि वो जमींदार थे, तो अपने घर काम करने वाले के लिए कपड़ा दे रहे थे। लेकिन महेंद्रू में जब वे जहाज पर बैठे तो तुलसीदास मेहता जी ने उस नौकर से कहा कि अब तुम वापस चले जाओ, हम खुद ही साड़ी घर पहुंचा देंगे।
महुआ पहुंचने के बाद तुलसीदास मेहता जी साड़ी का बंडल लेकर साइकिल से उनके घर पहुंच गए। वहां नौकर ने दरवाजा खोला और पूछा– “आप कौन हैं?” तुलसीदास मेहता जी ने बड़े सहज भाव से कहा– “आप हमको नहीं पहचानते? हम आपके विधायक हैं।” इतने सरल व्यक्तित्व के धनी थे तुलसीदास मेहता जी।
इसके बाद 1969 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बने और कर्पूरी ठाकुर जी के मंत्रिमंडल में पहली बार मंत्री बने। 1972 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 1977 में जब कर्पूरी ठाकुर जी ने उनका टिकट काट दिया, तब भी उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा, प्रचंड लहर के बावजूद लगभग 17 हजार वोट हासिल किए।
इसके बाद 1980 में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। बाद में जब लोकदल (च) का गठन हुआ तो वे उसमें शामिल हो गए। वहां उपेंद्र नाथ वर्मा प्रदेश अध्यक्ष बने और तुलसीदास मेहता जी प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी संभालने लगे। 1985 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा। उनके सामने वीरेंद्र सिंह महोबिया थे।
वीरेंद्र सिंह का पूरे इलाके में इतना दहशत था कि पूरा जिला का राजपूत महोबिया के साथ था। बहुत लोग भी डर से तुलसीदास मेहता जी के गाड़ी में नहीं बैठते थे। तुलसीदास मेहता जी की गाड़ी में अविनाश जी और एक बस दो आदमी ही एंबेसडर गाड़ी में इनकेसाथ रहते थे। बहुत कोशिश की गई लड़ाई करने की, लेकिन तुलसीदास मेहता जी बोले– ”चुनाव भर कुछ नहीं करना है, शांति से ही चुनाव लड़ना है।” चुनाव जीत गए। पहली बार इसी समय बाइक खरीदे थे। उसके बाद लगातार 2000 तक चुनाव जीते।

वे लालू जी के ऐसे विश्वसनीय लोगों में थे, जिन्हें उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में ऊर्जा मंत्री बनाया
1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय लालू जी ने उन्हें उत्तर बिहार में टिकट वितरण की जिम्मेदारी देकर खुला नेतृत्व दिया था। तुलसीदास मेहता जी ने कुशवाहा समाज के अनगिनत लोगों को टिकट देकर राजनीति में पदार्पण करवाया और पहली बार बिहार में कुशवाहा समाज से लगभग 25-26 विधायक चुनाव जीतकर आए। रही राजनीतिक उत्तराधिकार की बात, तो तुलसीदास मेहता जी के राजनीतिक विचारों पर चलकर अनगिनत युवा आज भी राजनीति कर रहे हैं।
तुलसीदास मेहता जी ने अपने सुपुत्र आलोक मेहता जी का हाथ लालू प्रसाद जी को सौंपा था। कभी तुलसीदास मेहता जी लालू जी के विश्वासपात्र होने के साथ-साथ उनके अहम सहयोगी थे, तो आज उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते हुए आलोक मेहता जी तेजस्वी जी के अहम सहयोगी हैं।

तुलसीदास मेहता जी का एक अलग परिचय
तुलसीदास मेहता वह व्यक्तित्व थे, जिन्होंने समाजवादी राजनीति के साथ-साथ समावेशी विकास की विचारधारा को वैशाली की धरती पर अपने राजनीतिक गुरु अक्षयवट राय जी के नेतृत्व में जमीन पर उतारने का काम किया। बहुत कम लोग तुलसीदास मेहता के बारे में जानते हैं। वे कभी हाजिरजवाबी के लिए चर्चित नेता नहीं रहे, न ही लच्छेदार भाषणों के प्रतीक रहे। तुलसीदास मेहता जी हमेशा अपने काम के लिए जाने गए, समाज के वंचित और पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए जाने गए।
वैशाली की धरती पर बहुत कम ऐसे नेताओं का जन्म हुआ है, जो समावेशी विकास की सोच रखते हों। लेकिन जब तुलसीदास मेहता जी राजनीति में आए, उन्होंने समाजवाद के साथ-साथ समावेशी विकास की सोच रखने वाले नेताओं का एक समूह अक्षयवट राय जी के नेतृत्व में बनाया। इसका एक ही मकसद था कि समाज के उन पिछड़े वर्गों और वंचित वर्गों का राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान कैसे हो।
तुलसीदास मेहता जी मानते थे कि इस उत्थान का सबसे प्रभावी माध्यम गांधी जी द्वारा दिखाया गया वह रास्ता है, जिसमें ग्राम विकास को केंद्र में रखा गया था। गांव का विकास तभी कर सकते हैं, जब एक-दूसरे का हाथ पकड़कर साथ चलने की सोच हो। तुलसीदास मेहता जी ने विकास के लिए सहकारिता का रास्ता चुना और राजनीतिक बदलाव के लिए समाजवादियों के साथ मिलकर काम करने का मार्ग अपनाया।
इसी सोच और प्रयासों से वैशाली जिले में सहकारिता की एक नई क्रांति का जन्म हुआ, जिसके शिल्पकार तुलसीदास मेहता जी थे। पिछड़े और दलितों के गांवों में दर्जनों शैक्षणिक संस्थान खोले गए, जिसके महत्वपूर्ण अंग तुलसीदास मेहता जी रहे। लेकिन तुलसीदास मेहता जी की राजनीतिक पटल के परिदृश्य पर बहुत कम लोग उनके इस स्वभाव और इस चीज से परिचित हैं।
तुलसीदास मेहता जी ने सहकारिता क्षेत्र में अपने किए गए कार्यों के दम पर हजारों लोगों को नौकरियां दीं। उसके बाद The Vaishali Cooperative Bank और Cooperative Cold Storage सहकारिता संस्थान, जो किसानों के लिए बनाए गए, महुआ Cooperative Bank, इन तमाम संस्थानों के निर्माण और विकास तुलसीदास मेहता जी के द्वारा किया गया।
तुलसीदास मेहता जी ने अपने राजनीतिक साथियों के साथ मिलकर पिछड़े और दलितों के गांवों में आर्थिक सहायता हो या जमीन की सहायता, उसके बदले ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। जिससे वहां के लोग शिक्षित भी हो और उस स्कूल में चुनाव के समय पोलिंग बूथ बने जिससे अपने मताधिकार कर प्रयोग कर सके क्योंकि इस वक्त तक केवल सवर्णों के गांव में स्कूल था जहां वोट डाले जाते थे लेकिन पिछड़े समाज के लोगों को डराया धमकाया जाता था जिस वजह वोट डालने नहीं जा पाते थे।
दर्जनों प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना में उनका योगदान रहा। महुआ और जंदाहा के बीच पिछड़ों के बीच जितने भी उच्च विद्यालय हैं, उनमें इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैसे–मिर्जानगर उच्च विद्यालय, नीलकंठपुर उच्च विद्यालय, बाकरपुर उच्च विद्यालय, चकसिकंदर उच्च विद्यालय, बावन घाट उच्च विद्यालय और ऐसे कई अन्य शैक्षणिक संस्थानों की उन्होंने स्थापना करवाई, जिनमें वे सचिव भी रहे।
खासकर एक शैक्षणिक संस्थान बिहार विश्वविद्यालय के ‘समता महाविद्यालय’, जंदाहा के रूप में प्रचलित है, जिसके वे संस्थापक सचिव रहे।जबकि उसकी जमीन यादव समाज और अन्य समाज के लोगों की थी, लेकिन कुशवाहा समाज की उसमें एक धुर जमीन नहीं थी, फिर भी पिछड़े समाज में इतना वजूद था कि इनको सचिव बना के रखा बाद में ये बिहार सरकार को दे दिए। तुलसी दास मेहता जी ने अपने कलम से 198 लोगों को केवल समता महाविद्यालय में नौकरी दी उसी 198 लोगों में से एक आज के कुशवाहा समाज के बड़े नेता आदरणीय ‘उपेंद्र कुशवाहा’ भी थे।

हालांकि, आप यह कह सकते हैं कि जब तुलसीदास मेहता जी उम्र के पड़ाव पर आ गए, तो बाद के दिनों में जिन लोगों के हाथों में उन्होंने ऐसे संस्थानों को सौंपा, उन लोगों ने उन्हें सही तरीके से संचालित नहीं किया और संस्थानों को पतन की ओर ला दिया। कुछ संस्थानों को तो पूरी तरह पतन की ओर धकेल दिया गया। लेकिन फिर भी, कुशवाहा समाज कि राजनीति, वैशाली की राजनीति हो या बिहार की राजनीति, उसमें तुलसीदास मेहता जी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

































